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ज़िंदगी का एक मोड़ ऐसा भी आया

जहाँ आकर जी ज़ोर से घबराया

शायद आभास था आने वाला वक़्त का

शायद सफ़र का हो ये आख़िरी रास्ता

 

पन्नों पर उतर आए चंद शब्द

अंतर्मन में गिरफ़्त थे जो आज तक

कांपते हाथ पूछ रहे थे गहरे सवाल

डर “/ “Fearing what will happen ? “

 

शिथिल पड़े हाथ पाँव संभालूँ तो कैसे ?

बेजान होते अपने शरीर को देखूँ तो कैसे ?

सहमे हुए प्रियजनों को सहलाऊँ तो कैसे ?

विदाई की बेला को रोकूँ तो कैसे ?

                                                    

इन छः महीनों में ज़िंदगी मानो थम सी गयी

क्यों बेड़ियों में जकड़ ली मुझे Neuropathy ?

शाम जो बदल रही थी सुबह में कभी

अब अस्पताल में ढूँढ रही थी लालिमा कहीं

 

कांपते होंठ कुछ बुदबुदा रहे हैं

वेंटिलेटर में क़ैद अब हाँफ रहें हैं

” Feeling thirsty “

लिखकर शायद अपनी प्यास बुझा रहें हैं

 

ज़िंदगी के लम्हे बिखर रहें है यूँ

शब्दों से स्याह रिस रहें हो मानो

लौ अब भभक रही है दिए में

साँस अब नहीं रही मेरी गिरफ़्त में

 

पलों दूर हूँ, अब रोको ना मुझे

ड्योढ़ी पार रहीं हूँ , अब बांधो ना मुझे

Bio: Shilpa Dikshit Thapliyal is a former computer professional turned home maker turned writer based in Singapore. She is a nominee of Pushcart Prize :Best of Small Presses Anthology 2021, and author of two poetry collections ‘Between Sips of Masala Chai’(Kitaab, 2019) and ‘Chimes of the Soul’ (self published-2015).
Her poems have been featured in anthologies, journals and online magazines in Singapore, India, USA. She has read poetry in Malaysia and at the Kala Ghoda Arts Festival, Mumbai .

हिम्मत से तू जिले ज़िंदगी

सुख और दुख तो पल दो पल है जैसे बसंत और पतझड़

चल कर गिरना, गिरकर सीखना और फिर आगे बढ़ना

रो रो कर क्यों जिए हम जब छोटी सी है ज़िंदगी

हिम्मत से तू जिले ज़िंदगी

आशा की उस अमर किरण से रोशन कर यह जीवन अपना

जैसे सूरज की एक किरण जगमगाती है संसार पूरा

रात चाहे हो लम्बी और गहरा हो अँधेरा

पर हर रात की सुबह होती है और अँधेरे के आगे उजाला

हिम्मत से तू जिले ज़िंदगी

मर मर कर क्यों जिए हम जब यही जीवन क्या सत्य है

मरने से क्या डरना यारों जब आत्मा तो अमर है

मौत के डर की हार होगी जब अडिग आत्मबल से हो मुकाबला

फिर मुश्किलें कहा टिक पायेगी जब हिम्मत से करे सामना

हिम्मत से तू जिले ज़िंदगी

निराशा को दूर हटाकर हिम्मत का दीपक जला ले

विश्वास की राह पकड़कर चलता चल जीवन की डगर में

ख़ुशियाँ ही तो खड़ी है आगे तेरा स्वागत करने को

हिम्मत से तू जिले ज़िंदगी ।

Bio: I am 12 years old and student of Sec -1 in Raffles Institution, Singapore. I love to write and explore new things and cultures. I love music and I always try to develop new skills and hone previous skills. I love to play the Handpan and Tabla. I am a huge sport fan and I play cricket, soccer, tennis and badminton. I write short stories and poems in my free time.

ये ज़रूरी नहीं

कि बुरे कामों को करने पर ही

दर्द सहना पड़ता है, कभी-कभी हद से

ज्यादा अच्छे बन जाने की भी सज़ा मिलती है…..

 

ये ज़रूरी नहीं

कि ज़िंदगी की राह में आने वाले

हर एक सवाल का जवाब मिले, कभी-कभी

सही जवाब मिल जाने पर भी सज़ा मिलती है…..

 

ये ज़रूरी नहीं

कि कोई जज़्बात उठने न दो, पर

कभी-कभी इन्हीं जज़्बातों को बड़ी ही

शिद्दत से निभाए जाने की भी सज़ा मिलती है……

 

ये ज़रूरी नहीं

कि दोस्त की शक्ल में सभी दोस्त

मिलें, कभी-कभी दुश्मनों की लगी भीड़

में दोस्ती निभाए जाने की भी सज़ा मिलती है…….

 

ये ज़रूरी नहीं

कि हर खूबसूरत ख्व़ाब की शक्ल

में सभी ख्व़ाहिशें शामिल हो, कभी-कभी

आँखों में नींद न आने की भी सज़ा मिलती है…….

 

ये ज़रूरी नहीं

कि हर एक पत्थर से सिर्फ बुत बनाया

जाए, कभी-कभी पत्थर तराशने वाले को

खुदा की मूरत तराशने की भी सज़ा मिलती है……

 

ये ज़रूरी नहीं

कि हर गुनाहगार को उसके किए हर

गुनाह की सज़ा मिले, कभी-कभी बेगुनाह

को उसके बेकसूर होने की भी सज़ा मिलती है…….

 

ये ज़रूरी नहीं

कि हर इबादतगाह में जाने वाले हर

शख्स की हर एक दुआ कबूल हो, कभी-कभी

शिद्दत से की गई इबादत की भी सज़ा मिलती है……

Bio: एक आवाज़ हूँ मैं राज़ हूँ, बोलना मेरी आदत है तो एक जर्नलिस्ट हूँ और लिखना मेरा शौक है तो एक राइटर भी हूँ, फिर भी खुद की खोज में हूँ उस मृग की भांति जो कस्तूरी खोजता है। आप मुझे राज माहुर के नाम से जानते हैं, जो उम्मीदों के पंख लगाकर उड़ना चाहता है और चांद को अपनी महबूबा कहता है और उसे जमीं पर लाना चाहता है।

हालातो हार कर एक सवेरा लाऊंगा,

वक़्त का मारा मे वक़्त को हंराऊगा

वादे करता नही, इन वादो को निभाऊगा

वक़्त का मारा मैं को हंराऊगा(2×)

इन बाज़ो के झुंड मे अब घोंसला बनाऊंगा,

चिडिया को अब मैं बाज़ से लड़ाऊगा,

वक़्त का मारा मैं वक़्त को हंराऊगा(2×)

शत्रुओं का लाल हूँ पर शत्रु को हंराऊगा,

लव्जो कि ज्वाला मेरी बेडियाँ पिघलायेगी,

नम पडी इस आग को फिर जलाएगी,

काली का श्रृंगार हूँ, मैं श्रृष्टि का सार हूँ मै,

काली पड़ी गहरी इन रातों को शिकार हूँ मै (2×)

मौहल्त का परिंदा हूँ आजादी से हूँ डरता,

सपने देखता मगर उड़ने से हैं डरता,

लफ़्ज़ो की ज्वाला मेरी बेडियाँ पिघालायेगी,

वक़्त का मारा मैं वक़्त को हंराऊगा (2×)

ईद का दिन था

सुबह सुबह किसी ने टोका

“ईद मुबारक हो!”

मैंने कहा

“आपको भी ईद मुबारक हो!”

सवाल हुआ

“नमाज़ पढ़ने नहीं गए, लेकिन स्वीमिंग करने जा रहे हो!”

मैंने कहा

“हाँ, मैं नहीं गया

क्यूँकि मैं नाराज़ हूँ उस ख़ुदा से

जो ये दुनिया बना के भूल गया है

जो कहीं खो गया है

या शायद सो गया है

या जिसकी आँखें फूट गई हैं

जिसे कुछ दिखाई नहीं देता

कि उसकी बनायी हुई इस दुनिया में क्या क्या हो रहा है!”

 

“हाँ, मैं नाराज़ हूँ

और तब तक मस्जिद में क़दम नहीं रखूँगा

जब तक आयलन कुर्दी फिर से ज़िन्दा नहीं होता

जब तक दिल्ली की वो दो लड़कियाँ

सही सलामत वापस नहीं आतीं

जिन्हें जलते हुए तारकोल के ड्रम में

सिर्फ़ इसलिए डाला गया था

क्यूँकि वो मुसलमान थीं

और हाँ, मुझे उनके चेहरे पे कोई दाग़ नहीं चाहिए”

 

“मैं नाराज़ हूँ

और तब तक मस्जिद में क़दम न रखूँगा

जब तक हरप्रीत कौर और हर पंजाबन औरत और बच्ची

बिना ख़ंजर लिए सुकून से नहीं सोती

जब तक दंगों में गुम मंटो की शरीफ़न

अपने बाप क़ासिम को मिल नहीं जाती

तब तक मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा”

 

“मुझे तुम्हारे क़ुरआन पे पूरा भरोसा है

बस उसमें से ये जहन्नुम का डर निकाल दो

ये डर की इबादत भी भला कोई इबादत है?

कैसा होता कि मैं अपनी ख़ुशी से

जब चाहे मस्जिद में आता

और एक रकअत में ही गहरी नींद

और तेरी गोद में सो जाता!”

 

“मुझे तुमसे शिकायत है

एक सेब खाने की आदम को इतनी बड़ी सज़ा?

तुम्हें शरम नहीं आती?

तुम्हारा कलेजा नहीं पसीजता?”

 

“यहाँ तुम्हारे मौलवी

मस्जिद की तामीर के लिए

कमीशन पे चन्दा इकट्ठा कर रहे हैं

जहाँ ग़रीबों को दो रोटी नसीब नहीं

वहाँ मूर्तियों पे करोड़ों रुपए पानी की तरह बह रहे हैं

तुम्हारे नाम पे यहाँ रोज़

जाने कितने मर रहे हैं”

 

“तुम्हें पता भी है कुछ?

लोग पाकिस्तान को इस्लामिक देश कहते हैं

तुम्हें हँसी नहीं आती?

और तुम्हें शरम भी नहीं आती?

तुम्हारी मासूम बच्चियों को पढ़ने से रोका जाता है

कोई सर उठाए तो उन्हें गोली भी मार देते हैं

तुमने एक मलाला को बचा लिया तो ज़्यादा ख़ुश न होओ”

 

“तुम्हारे आँसू नहीं बहते?

जब किसी बोहरी लड़की का

ज़बर्दस्ती ख़तना किया जाता है!

क्या तुम्हें उन मासूम लड़कियों की चीख़ सुनाई नहीं देती?”

 

“या तो तुम बहरे हो गए हो

या तुम्हारे कान ही नहीं हैं

या फिर तुम ही नहीं हो”

 

“तुम तो कहते हो तुम ज़र्रे-ज़र्रे में हो!

फिर जब कोई मंसूर अनल-हक़ कहता है

तब उसकी ज़बान काट क्यूँ ली जाती है?”

 

“क्या उस कटी ज़बान से टपके ख़ून में तुम नहीं थे?

क्या मंसूर की उन चमकती आँखों में

तुम उस वक़्त मौजूद नहीं थे?

जो तुम्हारी आँखों के सामने फोड़ दी गईं?”

 

“क्या मंसूर के उन हाथों में तुम नहीं थे, जो काट दिए गए?

क्या मंसूर के पैर कटते ही

तुम भी अपाहिज हो गए?”

 

“आओ, आके देखो अपनी दुनिया का हाल

आबादी बहुत बढ़ चुकी है

अब सिर्फ़ एक मुहम्मद से काम नहीं चलेगा

तुम्हें पैग़म्बरों की पूरी फ़ौज भेजनी होगी

क्यूँकि मूसा तो यहूदियों के हो गए

और ईसा को ईसाइयों ने हथिया लिया

दाऊद बोहरी हो गए

बुद्ध का अपना ही एक संघ है

महावीर, जो एक चींटी भी मारने से डरते थे

उस देश में इन्सान की लाश के टुकड़े

काग़ज़ की तरह बिखरे मिलते हैं”

 

“जाने कितने दीन धरम मनगढ़ंत हैं

श्‍वेताम्बर, दिगम्बर, जाने कितने पंथ हैं

आदम की औलाद सब, जाने कैसे बिखर गए

तुम्हारे सब पैग़म्बरों के टुकड़े-टुकड़े हो गए”

 

“तुम तो मुहम्मद की

इबादत में बहे आँसुओं से ख़ुश हो लिए

मगर क्या तुम्हें ये सूखी धरती दिखाई नहीं देती?

ये किसान दिखाई नहीं देते?”

 

“तेरी दुनिया में आज

अनाज पैदा करने वाले ही भूखे मरते हैं

मुझे हँसी आती है तेरे निज़ाम पर

और तू मुझे जहन्नुम का डर दिखाता है?”

 

“जा, मैं नहीं डरता तेरी दोज़ख़ की आग से

यहाँ ज़िन्दगी कौन सी जहन्नुम से कम है!

पीने का पानी तक तो पैसे में बिकता है!”

 

“तू पहले हिन्दुस्तान की औरतों को

मस्जिद में जाने की इजाज़त दिला

तू पहले अपने मुल्ला-मौलवियों को समझा

कि लोगों को इस तरह गुमराह न करें

तीन बार तलाक़ कह देने से ही तलाक़ नहीं होता!”

 

“तू आके देख

मदरसों में मासूम बच्चों को क़ुरआन

पढ़ाया नहीं, रटाया जाता है

फिर इन्हीं रटंतु तोतों को हाफ़िज़ बनाया जाता है

जो तेरी बा-कमाल आयतों को तोड़-मरोड़ कर

अपने फ़ाएदे के लिए इस्तेमाल करते हैं”

 

“मैं किस मस्जिद में जाऊँ?

तू तो मुझे वहाँ मिलता नहीं!

और तेरे दर, काबा आने के इतने पैसे लगते हैं!

जहाँ हर साल भगदड़ होती है

और न जाने कितने ही बेवक़ूफ़ मरते हैं!”

 

“मैं कहता हूँ

इतनी भीड़ में जाने की ज़रूरत क्या है?

कितना अच्छा होता कि मैं मक्का पैदल आता!

और तू मुझे वहाँ अकेला मिलता!”

 

“तू पहले ये सरहदें हटा दे

ये क्या बात हुई

कि तेरे काबा पे अब सिर्फ़ कुछ शेख़ों का हक़ है?”

 

“तू पहले समझा उन पागलों को

कि तुझे सोने के तारों से बुनी चादर नहीं चाहिए!

मैं तब आऊँगा वहाँ

अभी तेरी मस्जिद में आने का दिल नहीं करता!

जानता है क्यूँ?”

 

“अँधेरी ईस्ट की साईं गली वाली मस्जिद के बाहर

एक मासूम सी लड़की

आँखों में उम्मीद लिए और हाथ फैलाए हुए

भीख माँगती है

मैं उसे पाँच रुपये देने से पहले सोचता हूँ

कि इसकी आदत ख़राब हो जाएगी!

फिर ये इसी तरह भीख माँगती रह जाएगी

अगर मैं उससे थोड़ी हमदर्दी दिखाऊँ

तो लोगों की नज़र में, मेरी नज़र ख़राब है

मैं उसे अपने घर भी ला नहीं सकता

कुछ तो घर वाले लाने नहीं देंगे

और कुछ तो उसके मालिक भी”

 

“हाँ, शायद तुम्हें किसी ने बताया नहीं होगा

हिन्दुस्तान में बच्चों से भीख मँगवाने का

बा-क़ाएदा कारोबार चलता है

मासूम बच्चों को पहले अगवा किया जाता है

फिर कुछ की आँखें फोड़ दी जाती हैं

कुछ के हाथ काट दिए जाते हैं, कुछ के पैर!

और फिर तेरी ही बनायी हुई क़ुदरत

रहम का सहारा लेकर

तेरे ही नाम पे

उनसे भीख मँगवाया जाता है”

 

“अब मैंने तुझे सब बता दिया

अब तू कुछ कर!

तू इन मासूम बच्चों को पहले इस क़ैद से रिहा कर!

तब मैं तेरी मस्जिद में आऊँगा

तेरे आगे सिर भी झुकाऊँगा

अभी मुझे लगता है

तू इबादत के क़ाबिल नहीं!

अभी तुझको बहुत से इम्तिहान पास करने होंगे!”

 

“हाँ, इम्तिहान से याद आया

ये तूने कैसी बकवास दुनिया बनायी है?

जो सिर्फ़ पैसे से चलती है?”

 

“मुझे इस पैसे से नफ़रत है

ये निज़ाम बदलने की ज़रूरत है”

 

“तुम पहले कोई ढँग की रहने लायक़ दुनिया बनाओ

फिर मुझे नमाज़ के लिए बुलाओ”

 

“और तब तक

तुम यहाँ से दफ़ा हो जाओ!!!”

Bio: Qais Jaunpuri is a Civil Engineer by profession with 17 years of experience at various locations including Delhi, Gurgaon, London and Mumbai. As a Writer & Poet, his notable works are MERI NIYAAZ TU (Song, T-Series, 2019), FIREBRAND (Film, Additional Hindi Dialogues, NETFLIX, 2019), AMRAVATI (Web-Series, 2018), CHHOTI DURGA (Audio Book, Storytel, 2018), SWAMI VIVEKANAND (Play, 2012)

सत्य यदि बोलना है तो 

झूठ-पसंद लोगों से पिटना भी तय है

थाने में बुलाया जाना भी तय है 

और पूछताछ के नाम पर 

थानेदार की गालियाँ खाना भी तय है 

ईमानदार यदि बने रहना है तो फिर

भूख और गरीबी में जीना भी 

पक्का तय है बन्धु रे!

मनुष्य यदि बने रहना है तो

दुख पाना भी तय है 

और मनुष्यता के शत्रुओं द्वारा

सताया जाना भी तय है 

न्याय और अधिकार के लिये 

अनवरत लड़ना भी तय है

और यदि तुमने तय किया है सुख 

सुविधा और अधिकाधिक पूँजी बनाना ही

तो वाक़ई तय है तुम्हारा 

सत्य न्याय और ईमान से दूर होना

Bio: हिन्दी कवि,अब तक सात कविता संग्रह (हिन्दी) प्रकाशित |गद्य लेखन में भी रुचि है |

मरना तो निश्चित ही है किन्तु 

मरने की चिन्ता में जीने से भागना

उबलते तैल के कड़ाहे में

तिल तिल कर मरना या 

कमलपंखुरियों में बन्द हो कर 

साँस घुटते हुये मरना अथवा

कि दलदल में धंसते हुये आह! 

जीने की इच्छा को यों ही

बनाये रखने के लिये

तपते-सिंकते जाना सुलगती आग में

अरे नहीं रे कवि! 

दहकती आग में एक साथ 

जल कर मर जाना

अब तो सिर्फ़ सपना रहा

Bio: हिन्दी कवि,अब तक सात कविता संग्रह (हिन्दी) प्रकाशित |गद्य लेखन में भी रुचि है |

झपट्टा मारने के लिये 

फड़फड़ा रहा है बाज़

कबूतरों ने आँखें मूंद ली हैं 

शुतुरमुर्गों के सिर 

ज़मीन में धँस रहे हैं 

मोर आँसू टपका रहे हैं 

अपने पाँवों को देख कर

मोरनियाँ कर रही हैं विलाप 

और कौए व्यस्त हैं 

बकवादी बहस में 

उधर हँस 

पुरस्कार लेने जा रहे हैं 

सुसज्जित 

ऐन उसी वक़्त 

एक चिड़िया 

अपने पंख तौल रही है 

बैठने को

बाज़ की पीठ पर 

Bio: हिन्दी कवि,अब तक सात कविता संग्रह (हिन्दी) प्रकाशित |गद्य लेखन में भी रुचि है |

लोग कहते हैं देश महान है

 मै कहता हूं तब तक है

जब तक हमारे जवान है ।

 नेताओं में कारण ना हिन्दुस्तान महान है

नेताओं से ना जनमत का सम्मान है ।

वीर जवानों में ही बसता सच्चा हिन्दुस्तान है

 जवानों के कर्तव्यपरायण से हमारा जीवन विधमान है । जवानों से ही धरती माँ का सम्मान है स्वाभिमान है

मेरा देश महान है क्योंकि मेरे वीर जवान तैनात है ।

मातृ भूमि की खातिर लडते जब तक श्वास है

लेकिन उनके चले जाने के बाद परिवार के सुखों पर कारावास है

बच्चों के सर से साया छुट जाता है

वीर प्रसुता मां की कोख उजड़ जाती है ।

 पिता की लाठी हमेशा के लिए टुट जाती है

भाई की बुझाओ में रक्त शान्त हो जाता है ।

 बहन अपना रक्षासूत्र मातृभूमि के आगे बलिदान कर देती है विरांगना की मांग हमेशा के लिए बेरंग हो जाती है ।

किसी का मिलने से पहले साथ छुट जाता है

ऐसे पुरा परिवार शहीद होता है

इन परिवारों से हिन्दुस्तान महान बनता है ।

वीर जवानों को ” नवीन” नमन करता है।

Bio: Naveen Kumar yadav belong From Alwar Rajasthan India…I m Upsc Aspirant.and I write Blog….my articles publish in newspapers…

चाहे लोग बग़ावत कर दें 

        आफ़त में भी आफ़त कर दें,

                चाहे राह के हर पत्थर को 

                        संघर्षों का पर्वत कर दें 

         चाहे दुनिया कुछ भी कर ले

         पर  विपरीत   हमें  करनी है ।

         भय बिन  प्रीत हमें करनी है ।।

(१) 

बस तुम मोड़ पे मत मुड़ जाना

        ग़लत तरीका मत अपनाना, 

                उकसायेंगे लोग तुम्हें पर 

                        अपने ज़िद की हद कर जाना

         बस तुम   साथ हमारा देना 

         मुश्किल जीत हमें करनी है ।

         भय बिन प्रीत हमें करनी है ।।

(२) 

कुछ ऐसे भी पल आएंगे

        जिस पल पाँव फिसल जाएंगे,

                जिस पल धर्म छलेगा तुमको

                       आँख में आँसू जल जाएंगे

         उस पल तम की हर ड्योढ़ी पर

         ज्योति   प्रदीप्त  हमें   करनी है ।

         भय  बिन  प्रीत   हमें करनी  है ।।

Bio: उत्तर प्रदेश के अम्बेड़कर नगर ज़िले का निवासी हूँ ।
मैं वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी और संस्कृत से स्नातक पूर्ण कर रहा हूँ…।
कविता लेखन को मैं एक प्रकार से अपना काम मानता हूँ ।

चलतेचलते एक दिन

मैं रास्ते से बाते करने लगी

थकता नहीं है तू, क्या कभी

उससे मैं कहने लगी

हो के भौचका, मैं उन रास्तों को देखने लगी

ना जानें, चलतेचलते कितने गाँव छोङ आया

ना जानें, कितनी धाराओं में बटता चला आया

ना जानें, तू कितने पेङों को साथी बना आया

ना जानें तू, हमराही बनाकर उनको

चलतेचलते उन से क्या बाते कर आया

 

कभी तू पहाङो से टकराकर मूङ जाता है

कभी तू किसी घाट पर रूक जाता है

कभी तू गाँव में डेरा जमा जाता है

होली की मस्ती लिए, दिवाली के दीये के साथ

हर गाँवशहर चलता चला जाता है

 

पनीहारिन के साथ चलने में तुझको बङा मजा आता है

किसानों के साथ भी तू हठकेलियाँ दिखाता है

कभी पतली सी पगडंडी में चलता चला जाता है

तो कभी चौङे सङक में बिखर जाता है

कभीकभी तो, तू किसी मुहानें पर आकर रूक जाता है

कई बार तो, तू चौराहे की भीङ में खो जाता है

 

पर हर बार एक सवाल तू मेरे दिल में दिये जाता है

तू कभी रूकता नहीं है, कभी थकता नहीं है

कहाँ से तू शुरू होता है

कहाँ तक तू चलता चला जाता है

बस हमेशा मेरे दिल में ये सवाल उठता है

Bio: Nisha Nik “ख्याति” हिन्दी की एक कवियत्री, रचनाकार एंव लेखिका हैं। Nisha Nik “ख्याति” का वास्तविक नाम Nisha Kumar है, लेकिन ये Nisha Nik “ख्याति” के नाम से लेखन करती हैं। Nisha Nik “ख्याति” का जन्म 20 अगस्त 1996 में हुआ हैं। इनकी अब तक की शिक्षा हिन्दी से स्नातकोत्तर तक हुई है, वर्तमान में ये शिक्षा ग्रहण करने के पथ पर अग्रसर हैं।
Nisha Nik “ख्याति” एक प्रगतिशील लेखिका हैं जो वर्तमान में सक्रिय रूप से अपने लेखन में लगी हुई हैं और अपने लेखन के निरंतर प्रयास से लेखन के भविष्य को उज्जवल और कृतिमान बनाना चाहती हैं। इनके अथक प्रयास में ईश्वर इनके साथ है, ये इनकी रचनाओं में बढ़ते भावों से साफ नजर आता है।

मैं बहुत थक गया हूं, जिन्दगी तेरे गिराने से

लेकिन मैं फिर उठूंगा, अभी मैं हारूगां नहीं

मंजिल मिली नहीं हैं, अभी नजर भी नहीं आती है

लेकिन मैं रूकूंगा नहीं, अभी मैं हारूगां नहीं

हां अंधेरे से मैं डरता हूं,

कुछ देर रूकता भी हूं, लेकिन हार कर नहीं

फिर खङे होने के लिए

जिन्दगी मैं डरता नहीं, अभी मैं हारूगां नहीं

कई बार तेरे फैसले से मैं टूट जाता हूं

तुझ से शिकायते भी बहुत करता हूं

फिर भी मैं रूकूंगा नही, अभी मैं हारूगां नहीं

अभी थका मेरा शरीर है, मेरा मनोबल नहीं

जिन्दगी, तू कितनी बार गिरायेगा मुझे,

मैं उतनी बार उठूंगा, अभी मैं हारूगां नहीं

सफर मैंने अकेले ही शुरू किया था

लेकिन जिन्दगी, राह में तूने साथी दिये बहुत

अगर सफर में तू मुझे फिर अकेला कर देगा

तो भी मैं रूकूंगा नहीं, अभी मैं हारूगां नहीं 

Bio: Nisha Nik “ख्याति” हिन्दी की एक कवियत्री, रचनाकार एंव लेखिका हैं। Nisha Nik “ख्याति” का वास्तविक नाम Nisha Kumar है, लेकिन ये Nisha Nik “ख्याति” के नाम से लेखन करती हैं। Nisha Nik “ख्याति” का जन्म 20 अगस्त 1996 में हुआ हैं। इनकी अब तक की शिक्षा हिन्दी से स्नातकोत्तर तक हुई है, वर्तमान में ये शिक्षा ग्रहण करने के पथ पर अग्रसर हैं।
Nisha Nik “ख्याति” एक प्रगतिशील लेखिका हैं जो वर्तमान में सक्रिय रूप से अपने लेखन में लगी हुई हैं और अपने लेखन के निरंतर प्रयास से लेखन के भविष्य को उज्जवल और कृतिमान बनाना चाहती हैं। इनके अथक प्रयास में ईश्वर इनके साथ है, ये इनकी रचनाओं में बढ़ते भावों से साफ नजर आता है।

गांव से निकलने से पहले

मैं शहर के सपने सजा रहा था

शहर आकर गांव में जो याद रह कर भी

मां का दिया अचार छोड़ आया

उसको याद कर रहा था

 

मां जब खाना देती थी

रोज वही सब्जी रोटी देती है

कुछ नया बना, कहता था

गांव में रहते हुए सोचता था

शहर में खूब अच्छा खाऊंगा

आज उसको खाते हुए

मां की वही रोटी याद कर रहा था

Bio: Nisha Nik “ख्याति” हिन्दी की एक कवियत्री, रचनाकार एंव लेखिका हैं। Nisha Nik “ख्याति” का वास्तविक नाम Nisha Kumar है, लेकिन ये Nisha Nik “ख्याति” के नाम से लेखन करती हैं। Nisha Nik “ख्याति” का जन्म 20 अगस्त 1996 में हुआ हैं। इनकी अब तक की शिक्षा हिन्दी से स्नातकोत्तर तक हुई है, वर्तमान में ये शिक्षा ग्रहण करने के पथ पर अग्रसर हैं।
Nisha Nik “ख्याति” एक प्रगतिशील लेखिका हैं जो वर्तमान में सक्रिय रूप से अपने लेखन में लगी हुई हैं और अपने लेखन के निरंतर प्रयास से लेखन के भविष्य को उज्जवल और कृतिमान बनाना चाहती हैं। इनके अथक प्रयास में ईश्वर इनके साथ है, ये इनकी रचनाओं में बढ़ते भावों से साफ नजर आता है।

बीमारी तो बस जिस्म को गिरफ़्तार करती है

इंसानों की बातें तो रूह को भी लाचार करती है।

चरम रोग में जब वो खोजता है पल जीने के

दुनियाभर की तोहमतें उस पर वार करती हैं।

आज़ादी भी मुख फ़ेर लेती है उस शख़्स से

जब बंदिशें उस पर अपना अधिकार करती हैं।

छिन जाती है हर ख़ुशी उस शख़्स की

ये दुनिया जब उसे दरकिनार करती है।।

 

अब अपनों को गले वो लगाए भी कैसे

ये वबा हर ख़्वाहिश को तार तार करती है।

माँ-बाप के चरण और बच्चों कि छुअन खो से जाते है तब

जब बीमारी घातक प्रहार करती है।

अब अपनी मुहब्बत को वो जताए भी तो कैसे

मर्ज़ तो जज़्बातों पर भी इख़्तियार करती है।

दोस्तों से मिलना भी ख़त्म हो जाता है

बीमारी इस तरह से शख़्स को बेज़ार करती है।।

मरने से पहले ही उसे मार दिया जाता है

ज़िंदगी उस से जी उठने की गुहार करती है।

फ़िज़ूल समझता है अब वो ख़ुद को

दुनिया इस हद तक उसे बेकार करती है।

अलालत कोई गुनाह हो जैसे

इस तरह हर बज़्म उसे शर्मसार करती है।

टूट जाता है शख़्स ऐसे की बस फ़िर

रूह जिस्म से निकलने का इंतज़ार करती है।।

 

आस​-पास का शोर जब जीना मुहाल कर देता है

एक अन्य टुकड़ी आ कर जीवन को गुलज़ार करती है।

टोली उनकी सकारात्मकता भर देती है दिलो-जान में

साथ ही नकारात्मकता का संहार करती है।

सोच में आता है उस शख़्स के कि ये मंडली कैसे

किसी अजनबी के लिए दिल को उदार करती है।

उस दुनिया से काफ़ी अलग है ये दुनिया

ये तो बस ख़ुशियों को अपार करती है।।

 

मरने से पहले कौन मरना चाहता है

ये समझते हुए ये टोली, बुझती ज़िंदगी को फ़िर अंगार​ करती है।

जिसे आस-पड़ोस ने भी ठुकरा दिया था

ये जगह उसे बख़ुशी स्वीकार करती है।

जी उठता है वो शख़्स वहाँ जा कर​

आख़िर वो जगह पिता सा स्नेह और माँ सा दुलार करती है।

इल्लत अब इल्लत नहीं लगती, यूँ बेलौस वो टुकड़ी

बचे हुए हर लम्हे को त्यौहार करती है।।

 

उस दुनिया ने तो धुत्कार दिया था उस शख़्स को

ये दुनिया उस पर बा-शिद्दत एतबार करती है।

सिर्फ़ जिस्म का ख़याल नहीं करती ये टोली

विचार और रूह में भी सुधार करती है।

मरना तो है ही उस शख़्स को इक दिन

उस दिन से पहले, टोली हर तरह से उसे सँवार कर तैयार करती है।

मरने से पहले जी उठता है वो आदम​

यूँ हास्पिस उस ख़ुदा का अवतार करती है।।

 

आख़िर जब मौत ले जाती है उस शख़्स को इक दिन

मानो ज़िंदगी तब उसकी मृत्यु पर क़रार करती है।

Bio: Professionally being a Software Engineer, Manisha Rana never thought to publish any of her written works. She just used to pen down her feelings whenever her heart felt heavy or whenever it was happy enough. It was during her graduating years when her close friend used to ping her to be in front and later on, another close friend who gave her the courage to do so. Finally, the friends succeeded.
It was their belief and words which made her to attend poetic events and think about publishing her works. Her Pen Name “Aashin” is nothing more than the combination of letters from their names.

हर उस शख्स की अलग पहचान है,

कोई मोटा तो कोई पतला

सबका अपना अपना आत्मसम्मान है

लोग नापते हैं उसे उसके आकार से,

तो कोई कहता उसे बेकार है…

 

लोग यह क्यों नहीं समझते कि…

आखिर है तो वह एक इंसान

अब दुनिया की  ही समझ देखो

 

कोई ज्यादा पतला हो जाए तो उसे खंबा बोलकर नकारा जाता है,

 और अगर कोई थोड़ा सा मोटा हो जाए तो उसे भैंस कहकर चिढ़ाया जाता है.

इन सब की कशमकश में उसे खुद का शारीरिक आकार नहीं भाता,

और अब वही व्यक्ति खुद को प्रश्नों भरी आंखों से है निहारता

और अंततः वही व्यक्ति खुद की खूबियों को ही नहीं पहचान पता

Bio: My name is Shashi kumari parewa am belongs to Rajasthan but live in Delhi since my birth and I am pursuing graduation and also aNCC cadet in Bharti College .My hobby is writing because which we don’t express in verbal language it will automatically expose by writing in some words or sentences. This is considered the power of the pen

कुछ वक़्त बिताते अच्छा था 

शायद रूक जाते अच्छा था 

पर छोड़ के ही गर जाना है 

और लौट के फिर ना आना है 

तो एक गुज़ारिश है मेरी 

कम से कम इतना कर जाना 

फिर ख्वाबों में भी मत आना 

हाँ ख्वाबों में भी मत आना 

क्या नमक रखा है चोटों पर 

पर दुआ रहेगी होठों पर 

गर ये चाहत जिस्मानी थी 

तो शायद मिलती कोठों पर 

अब वफ़ा के बदले दे ही दिया 

जब गम का तुमने नज़राना 

तो एक गुज़ारिश है मेरी 

फिर ख्वाबों में भी मत आना 

हाँ ख्वाबों में भी मत आना 

तुमसे अब क्या ही कहना है 

ये दर्द सितम सब सहना है 

रूह साथ तुम्हारे जायेगी 

इस लाश को जिन्दा रहना है 

तुमको मंजूर नहीं होगा 

इस लाश को शायद दफ़नाना 

तो एक गुज़ारिश है मेरी 

फिर ख्वाबों में भी मत आना 

हाँ ख्वाबों में भी मत आना 

कुछ वक़्त बिताते अच्छा था ….

तेरा नाम अपनी गज़ल में ,

सौ सौ दफ़ा लिक्खेंगे हम !

हाँ सिर्फ तू ही पढ़ सके ,

कुछ इस तरह लिक्खेंगे हम !

तेरे ज़हन में सवाल होगा ,

किस तरह लिक्खेंगे हम ?

तो यूँ ना डर ए बेवफ़ा ,

बस बेवफ़ा लिक्खेंगे हम !

कोई तेरा मिजाज पूछे ,

तो ख़फा लिक्खेंगे हम !

और पूछे इश्क़ क्या है ?

तो हवा लिक्खेंगे हम !

इक गज़ल में जिंदगी का ,

फल सफ़ा लिक्खेंगे हम !

बहुत खा लीं चोट हमने, 

अब दवा लिक्खेंगे हम !!

सुनो बचपन से लेकर जवानी गयी , 

वो लोरी वो खिलौने कहानी गयी !

वो होली वो राखी दीवाली गयी ,

तीज त्यौहार की शाम खाली गयी ! 

जिंदगी मौत का अब डर भी गया ,

घर बनाने की कोशिश में घर भी गया !

 

नींद और सुकूं सब लुटाते रहे ,

जान जोखिम में रखकर बचाते रहे ! 

सबको लगता है काफी कमाते रहे , 

वो क्या जाने कि हम क्या गंवाते रहे ?

 

वो क्या जाने कि क्या मेरे ख्वाबों में है , 

जिंदगी अब मरीज़ ओ किताबों में है !

 

हम डाक्टर हैं मगर जां हमारी भी है ,

प्यारे रिश्ते हैं और माँ हमारी भी है !

दर्द आखों से बाहर ना आने दिया ,

ख्वाहिशों को भी हँसकर के जाने दिया !

 

सारी दुनिया जब बैठी थी आराम पर ,

तब भी रातें हमारी कटीं काम पर !

बाजियाँ जान की हम लगाते रहेंगे ,

फ़र्ज अपना हमेशा निभाते रहेंगे !

गीत मुश्किल में ये गुनगुनाते रहेंगे ,

दर्द हो फिर भी हम मुस्कुराते रहेंगे !

 

हाँ जिंदगी मौत के बीच रिश्ते हैं हम ,

फ़ख्र है कि खुदा के फ़रिश्ते हैं हम !!

तुम सिर्फ धक्के लगाकर 

इसे बहुत दूर तक 

नहीं ले जा सकते 

और ना ही बैठा सकते हो 

हर बार इसमें अपनी 

मनपसंद सवारियां

जीवन की गाड़ी का 

ईंधन है प्रेम 

अगर ये है तो जीवन की 

आखिरी स्टेशन तक 

सकुशल पहुँचोगे तुम 

और तुम्हारी सवारियां भी..

Bio: मैं एक प्रगतिशील किसान हूँ मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। मैं बचपन से कविताएं पढ़ने और लिखने का शौकीन हूँ।
मेरा बचपन मध्य प्रदेश राज्य भारत देश के विदिशा जिले के ग्राम नगवासा में गुजरा है।
मेरा जन्म एक कृषक परिवार में हुआ है।
मैं एक गर्वित ग्रामीण भारतीय हूँ।
धन्यवाद।

हर बुझती दीये  की आशा हूँ क्या

ऐ ज़िन्दगी तेरे लिये पाशा हूँ क्या

चंद बुदें मुझे क्या पिघला सकेगीं,

मैं कोई बनिये का बताशा हूँ क्या

न बजाओ तालियाँ ख़मोशी बेहतर है,

मैं कोई नुक्कड़ का तमाशा हूँ क्या

कभी-कभी मिली हो इक बेरुखी़-सी,

किसी मोड़ का छूटा  निराशा हूँ क्या

ख़तम करो ये सारी बात-चीत ऐ मानस,

मैं कोई बजने वाला इक ताशा हूँ क्या

Bio: अपने बारे में कुछ कहना बेहद कठिन होता है एक शायर या कवि के लिए बहरहाल, फिर भी मैं एक छोटे शहर का एक छोटा सा कवि हूँ।मैं ज़िन्दगी कि दुशवारीयों पर ग़ज़ल या नज़्म कहने कि कोशिश करता हूँ।

अगर है चर्चा, तो सरेआम रहने दो।

मैं कवि हूं, मुझे गुमनाम रहने दो।

 

फूल नहीं होते मोहताज़,

किसी परिचय के।

बस उनकी खुशबुओं को बागबान रहने दो।

मैं कवि हूं, मुझे गुमनाम रहने दो।

 

अगर खुल गया नाम,

तो बट जाऊंगा जाती, धर्म, छेत्र में।

मुझे इंसानों की नस्ल में शुमार रहने दो।

मैं कवि हूं, मुझे गुमनाम रहने दो।

 

इश्क़ के किस्से तो,

बहुत मशगूल हो के  सुनते हैं सभी।

बस आशिक़ को यूं ही बदनाम रहने दो।

मैं कवि हूं, मुझे गुमनाम रहने दो।

 

रंग होता गर इस हवा का,

तो सांसे भी बट जाती तुम्हारी।

इस हवा को यूं ही अनजान बहने दो,

मैं कवि हूं, मुझे गुमनाम रहने दो।

 

ये नदियां नहीं पहचानती,

कोई भाषा, रंग, वेष, भूषा।

इन नदियों को यूं ही बेलगाम बहने दो,

मैं कवि हूं, मुझे गुमनाम रहने दो।

 

मयकदे नहीं पहचानते,

किसी भी जात को।

इन लड़खड़ाते क़दमों में इंसान रहने दो,

मैं कवि हूं, मुझे गुमनाम रहने दो।

 

लड़ा दिए लोग,

चंद वोटों की खातिर।

इस सफेद खादी में कुछ तो ईमान रहने दो,

मैं कवि हूं, मुझे गुमनाम रहने दो।

 

गर पूरी हो जाएं सारी ख्वाहिशें,

तो फिर मज़ा ही क्या है।

इस दिल में कुछ उम्मीदों के अरमान रहने दो,

मैं कवि हूं, मुझे गुमनाम रहने दो।

 

मंजिलों के मिलने की,

परवाह किसे है।

मुझे इन राहों में यूं ही गतिमान रहने दो,

मैं कवि हूं, मुझे गुमनाम रहने दो।

Bio: My name is Ankur Kamthan. I born in Gwalior and now living in Morena (Madhya Pradesh). I did my graduation in pharmacy from I.P.S. college of pharmacy (Gwalior). I worked in Jail department as a Pharmacist for two and a half years. Now I am a Banker by profession. I have an immense affection towards poetry and literature since my childhood. My hobby is traveling, taste different cuisines, reading and writing poems and novels. Though my hobby is traveling, I love to read travel related and adventurous novels. I also writes my travel experience. My web address is THECONFUSEDTRAVELER . I have written some poems.

तुमने भी तो देखा था उन्हें

गणपति बप्पा

तुम्हारे हजारों

आस्थावान श्रद्धालु

नर-नारी, बच्चे-बूढे़

पूरे हर्ष और उल्लास के उत्सव उपरांत

तुम्हारी विशाल भव्य प्रतिमाएं

विसर्जित करने के बाद

थके-मांदे बेसुध सोए थे

लातूर, तावशी, हासिलगढ़

और साथ लगते मंगरुल में

अभी मुर्गे ने पहली बांग दी ही थी

कि यकायक

आधा लाख लोगों की

सांसे थम गई

पलट गया सब कुछ

जिंदगी, तकदीर, भूगोल

पौ फटने से पहले ही

धरती फट गई

गणपति बप्पा

क्या तुम्हारा कलेजा नहीं फटा

राहत, बचाव, मदद,

सेना, पुलिस, स्वयंसेवी दल

राहत कोष भी भर गए लबालब

भूकंप से बचने वालों के लिए

किसी सुरक्षित स्थान पर

मकान भी बन जाएंगे

गणपति बप्पा!

मन का सूनापन कैसे भर पाओगे

कैसे सुलाओगे उन बच्चों को

जिन्हे मां की लोरी के बिना नींद नहीं आती

Bio: 14 Books published which include short stories, essays, poems, novels, plays and one-act-plays. A play based on rape was staged twice in New Delhi. I was awarded sahitya academy award, Sahara katha award, two books were published by Penguin. More than two dozens e-books in Hindi and English are available on Kindle of Amazon.

मैंने कहा था न

बार-बार मिलूंगा

अपने पीछे

दरवाजा बंद करके

तुमने सोचा था

‘चलो ये किस्सा यहीं खत्म हुआ’

मगर आज

‘शार्ट-सर्कट’ की तरह

मैं फिर तुम्हारे सामने हूं

और अब

मेरे पास

तुम्हारे हर दरवाजे की चाबी है

और तुम्हारे पास

मेरे वरण के सिवा

कोई विकल्प नहीं

Bio: 14 Books published which include short stories, essays, poems, novels, plays and one-act-plays. A play based on rape was staged twice in New Delhi. I was awarded sahitya academy award, Sahara katha award, two books were published by Penguin. More than two dozens e-books in Hindi and English are available on Kindle of Amazon.

छोटा-सा पौधा होता

तो आसानी से रोप देता

इधर या उधर

मां तो पूरा छतनार वृक्ष थी

शहर आई तो

अपनी जड़ें वहीं गांव में छोड़ आई

यहां कंकरीट भवनों के

निर्मोही पत्थर-घरों में रहने लगी

तो मुरझा गई

तेजी से बुढ़ा गई

यहां भला फुर्सत किसके पास थी

जो मां से बतियाता

उसका सुख-दुख सांझा करता

वहां गांव में

दीनू काका थे, जानकी ताई थी, विमला भाभी थी

इस शहर में यहां

बातचीत का माध्यम

टी. वी. था, अखबार था, मोबाइल था

इसीलिए मां

चुप हो गई

गुम हो गई

सिधार गई 

Bio: 14 Books published which include short stories, essays, poems, novels, plays and one-act-plays. A play based on rape was staged twice in New Delhi. I was awarded sahitya academy award, Sahara katha award, two books were published by Penguin. More than two dozens e-books in Hindi and English are available on Kindle of Amazon.

जब जीवन मिलता है तब संसार नया लगता है। खुशियां देता जीवन तो कभी दुख भी लाता।। 

 यही दुखद समय जीने का तरीका सिखाता।

जब तुम खुश हो तो दूसरों का ख्याल करो।।

जब मुश्किल वक्त हो तब गरीबों पर मलाल करो।

यही जीवन हमें सिखाता अपने जीवन में

 दूसरों का जीवन खुशहाल करो।।

(पिता के लिए एक असमाप्त कविता )

दुनिया थी क्योंकि दुनिया की याद थी

स्मृति की उंगली हाथ से छूट जाने के बाद

अजनबी चेहरों का एक जंगल था

जिन्हें वह बूढ़ा आदमी बार-बार पहचानने की कोशिश करता

और अंत में अपनी हैरानी में पस्त हो जाता

वह अपने बेटों से उनके नाम पूछता

और जानने पर ताज्जुब में पड़ जाता

कि हूबहू यही नाम तो उसके अपने बेटों के थे

जो उसकी थम चुकी स्मृति में बड़े हुए ही नहीं

ये  एकांत के नहीं

भयानक अकेलेपन के अनगिनत वर्ष थे

क्योंकि वर्षों को गिना जा सकता है

अकेलेपन की निविड़ता का कोई माप नहीं

ये जागती रातों और उनींदे दिनों के वर्ष थे

ये अचानक बहुत पीछे साफ-साफ देख लेने

और आगे का कुछ भी न देख पाने के वर्ष थे

ये बच्चों की तरह बहलाए जाने के वर्ष थे

बेहोशी के नीमअंधेरे वर्ष थे

इनमें न शब्दों का दाखिला था, न वाक्यों का प्रवेश

दृश्यों पर धुंध थी

कहना गले और दिमाग की भूलभुलैया में भटक कर रह जाता था

अस्फुट ध्वनियों में इच्छाओं के मानचित्र रास्ता भूल जाते थे

कहने की बेकली और न कह पाने की लाचारी में

रिसते हुए संवाद थे

जो प्रेतों की तरह अनकहे और अनसुने के बीच घूमते थे

एक उम्र थी जो इस तरह रीत जाती थी

एक जिया गया जीवन था

जो अपने नायक की याद से बाहर छटपटाता था

एक पूर्णविराम था

जो दरवाज़ा खुलने की आस में दस्तक देता था

‘कहीं-कहीं से तो खाली हाथ भी लौटती होगी तुम मृत्यु’,

डॉक्टरी पर्चों की आड़ी तिरछी लकीरों के पार उसे खड़ा देख

पहले पहल यही कहा था मैंने

पहले पहल मैंने झुठलाना चाहा था

पर्ची पर लिखा तुम्हारा नाम

पहले पहल कैंसर अस्पताल के गलियारों में से पीछे मुड़ते थे मेरे पाँव,

शब्दशः

मैं यों थामे रखती थी तुम्हारा हाथ

जैसे बालपन में किसी देवरे में धोक लगवाने ले जाते समय

तुम पकड़ती थी मेरी नन्ही हथेली

तुम्हें जीवित रहने से कोई मोह नहीं था

न था मृत्यु से कोई भय

पर चुभती सुइयों और घूमती मशीनों के बीच

तुम्हारी तेजोमय मुस्कान जीजिविषा से भरी थी

जैसे कहती हो ,’पलायन नहीं, लड़ेंगे’

धसकते कलेजे को थाम मैं भी कहती ,’लड़ेंगे और जीतेंगे’

पल भर के लिये मुझे लगने लगता

मृत्यु याचक की तरह खड़ी है

और लौट जायेगी मेरा हठ देख कर

मृत्यु के पास अनेक पैंतरे हैं मगर

है

कीमोथेरेपी से झड़ चुके तुम्हारे सुंदर केश,

कृश हो चुकी तुम्हारी कंचन काया,

बिस्तर तक सिमटती तुम्हारी दिनचर्या;

जब मैं किसी से नहीं हारी

तो उसने पीड़ा को भेजा

पीड़ा मृत्यु की दूत है

जो संधि का प्रस्ताव लेकर आती है

वो आयी और तुम्हारे अंग अंग में बस गयी

तुम असह्य पीड़ा का ठिकाना हो गयीं

तुम्हें पीड़ा में देखना मेरे लिए तुम्हारी पीड़ा से भी अधिक पीड़ादायक हो गया

मैंने मृत्यु से याचना की

वो धीरे से आयी

तुम्हें ले जाते समय मुझे देख मुस्कुराई होगी

मैंने नहीं जाना

मैंने यह भी नहीं जाना

कि यह किसकी मुक्ति थी

तुम्हारी

या मेरी?

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